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भोजपुरी आन्दोलन के इतिहास

bhojpuriaandolankaitihasbhojpuriडॉ. ब्रजभूषण मिश्र

मुज्जफरपुर , बिहार

आज जब संसद आ ओकरा बाहर भोजपुरी के संविधान का अष्टम अनुसूची में शामिल करे के माँग जोर पकड़ले बा। जन-प्रतिनिधियन पर दबाब बढ़े लागल बा कि ऊ एह दिसाईं कुछ करत काहे नइखे। समय-समय पर सरकार से आश्वासन न पा के खुश होखे वाला भोजपुरिया समाज एह बात से अनजान बा कि भोजुपरी के मान्यता खातिर सरकारी दरवाजा खटखटावे के पीछे, के लोग के भूमिका बा आ कवना-कवना आन्दोलन के योगदान बा। लगभग सत्तर बरिस का ऊपरे से चल रहल भाषा-साहित्य आ संस्कृति के एह आन्दोलनात्मक इतिहास के इआद कइल जरूरी बा।

पहिले आन्दोलन के शुरूआत करेवालन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन कइल जरूरी बा। हमनी का जाने चाहीं कि आन्दोलन के पहिलकी पीढ़ी, जवना में रघुवंष नारायण सिंह, राहुल सांकृत्यायन, कुलदीप नारायण राय ‘झड़प’, डॉ. स्वामीनाथ सिंह, राधामोहन राधेष, पाण्डेय नर्मदेष्वर सहाय, पं. गणेष चैबे, डॉ. कृश्णदेव उपाध्याय, आचार्य महेन्द्र शास्त्री, डॉ. उदय नारायण तिवारी, पाण्डेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह, कमला प्रसाद मिश्र ‘विप्र’ जइसन लोग कृति षेश बा। रास बिहारी पाण्डेय, डॉ. अनिल कुमार राय आंजनेय, रसिक बिहारी ओझा निर्भीक जइसन लोग के निधन से, आन्दोलन के दूसरकीयो पीढ़ी के लोग हमनी के छोड़ के जाये के शुरु कर देले बा।

भोजपुरी क्षेत्र के जनता राष्ट्रप्रेमी ह, राष्ट्रवादी चेतना के लहर में आपन अनदेखी कइल ओकर सोभाव ह। एही से, भोजुपरी, मान्यता के दिसाईं एतना पछुआ गइल बा। बाकिर, एह भाशा, एकरा साहित्य आ एकरा संस्कृति में अतना ऊर्जा बा कि एकर बढ़ंती अपने होत चल आ रहल बा। ई केकरो मुँहतकी ना कइलस। भोजपुरिया के पौरूश बनल रहल त ऊ देश-विदेश जहाँ-जहाँ गइल, ओकरा भाशा आ संस्कृति आपन छाप छोड़त गइल बा। भोजुपरी का ना त धर्माश्रय मिलल बा आ ना त राज्याश्रय। ई त जनाश्रय के बदौलत बढ़ल गइल बा। भोजपुरी में एतना धाह बा कि एकर आँच दूर तक पहुँचेला।

भोजुपरी आन्दोलन के भूमिका पर नजर दउरवला पर सम्मेलन-अधिवेशन, कवि-सम्मेलन, संस्था आ संगठन अउर पत्र-पत्रिका का प्रकाशन के योगदान लउकेला। एह में पत्र-पत्रिका आ पुस्तक प्रकाशन का माध्यम से भोजपुरी भाषा का प्रचार-प्रसार मिलल। लिखनिहारन का नया-नया लिखे के प्रेरणा मिलल। बहुत मिलल-जुलल कवि-सम्मेलन में भोजुपरी के कवि लोग जादा जमे लागल। एह से भोजपुरी के प्रति जागरूकता बढ़ल। भोजपुरी क्षेत्र के ओइसन लोग जे हिन्दी-संस्कृत में लिखत रहे, ओकरा लागल कि भोजुपरियो में लिखे के चाहीं।

संस्था-संगठन आ सम्मेलन-अधिवेषन के माध्यम से भोजपुरी भाषा-साहित्य के बढ़ंती खातिर काम करे, जागरूकता बढ़ावे के अवसर मिलल। मान्यता खातिर प्रयास करे में एह संस्था-संगठन-सम्मेलन आ अधिवेशन सब के लमहर योगदान बा।

हमनी के पुरूखा मुखराम सिंह जी के कल्पना, कुलदीप नारायण राय ‘झड़प’ के प्रयास, जनपदीय आन्दोलन के प्रमुख व्यक्तित्व परमेश्वरी लाल गुप्त के सहयोग से पहिला ‘भोजपुरी साहित्य सम्मेलन’ 1-2 मार्च 1946 के सीवान में सारन जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संगे में भइल।एह में बनारसी दास चतुर्वेदी के प्रेरणा बड़ा सहयोग कइलस। एह अवसर पर भोजपुरी का बारे में पहिला बेर संगठित रूप से सोचे-समझे, जाने-बुझे आ जनावे-बुझावे के अवसर मिलल।

सीवान अधिवेशन का सफलता से उत्साहित होके लगले ओही साल (1947 ई.) दिसम्बर महिना में ‘अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मेलन’ गोपालगंज में भइल, जवना के अध्यक्षता महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी कइलीं। ई अधिवेशन भोजुपरी अस्मिता के पहचान करावे में सफल रहल।

भोजपुरी आन्दोलन के गति देवे में ‘भोजपुरी संसद वाराणसी आ ‘भोजपुरी साहित्य मंडल’ बक्सर के नाम बड़ा महत्त्वपूर्ण बा। एह दूनू संस्थन के संचालक क्रमषः डॉ. स्वामीनाथ सिंह आ डॉ. कमला प्रसाद मिश्र व्रिप रहीं, जेकरा संयोजन में कई-कई गो आयोजन भइल, जवना में एक-से-एक विद्वान शामिल भइलें। भोजपुरी के ओर रूझान बढ़ावे में एह दूनों संस्थन के योगदान ना भुलावल जा सके। डॉ. स्वामीनाथ सिंह आ सारन के राधामोहन सिंह ‘राधेष’ भोजपुरी के भारतेन्दु साबित भइलें, जे पुस्तक आ पत्रिका प्रकाषन अउर कार्यक्रम आयोजन पर आपन धन-संपत्ति गला दिहलें।

‘जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिशद्’ जमशेदपुर आ ‘भोजपुरी परिवार’, पटना जइसन संस्थन के योगदान कइसे भुलावल जा सकत बा जे अपना प्रकाशन आ आयोजन से भोजपुरी आन्दोलन के गतिविध बनवले रहल। जमशेदपुर भो.सा.परि. आजो सक्रिय बा आ ढेर काम कर रहल बा। भोजपुरी परिवार, पतरातू थर्मल 16-17 बरिस ले सलाना दूदिना आयोजन करत रहल आ भोजपुरी के हलचल बनवले रहल। मान्यता के दिसाईं समय-समय पर मांग उठावल रहल।

भोजपुरी का मान्यता के दिसाईं 1970 का बाद के समय बड़ा महत्त्वपूर्ण बा 1970 का बादे आन्दोलन के गति तेज भइल। इहे ऊ समय रहे, जब पटना में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के स्थापना भइल। एकर पहिला अधिवेशन इलाहाबाद में दुसरका पटना में भइल। भोजपुरी साहित्यकारन के लमहर संख्या देष का कोना-कोना से एह संस्था का साथ जुड़ल। एह संस्था के चलावे में आचार्य पाण्डेय कपिल के योगदान के बराबरी केहू ना कर सकी। भोजपुरी साहित्य के एक दिषा देवे, साहित्यकार के एक मंच पर जुटावे, कलाकार लोग के असर प्रदान करे आ भोजपुरी का मान्यता के दिसाईं सतत प्रयास कइला से एह संस्था के स्थान आन संस्थन से बड़हन हो गइल। एह संस्था के संग डॉ. उदय नारायण तिवारी जइसन भाशा वैज्ञानिक, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जइसन विद्वान-साहित्यकार, डॉ. भगवत षरण उपाध्याय जइसन राजनयिक, डॉ. कृश्णदेव उपाध्याय आ पं. गणेष चौबे जइसन लोक साहित्य-संस्कृति के मर्मज्ञ, ईश्वरचन्द्र सिन्हा जइसन पत्रकार प्राचार्य विश्वनाथ सिंह जइसन भाषाविद, डॉ. विवेकी राय, डॉ. विद्यानिवास मिश्र, डॉ. केदारनाथ सिंह जइसन साहित्यकार लोग अध्यक्षता कर के दुनिया के भोजपुरी भाषा-साहित्य-संस्कृति का प्रति गंभीरता का साथे सोचे पर मजबूर कइल। एह संस्था का साथे बाबू जगजीवन राम आ केदार पाण्डेय जइसन राजनेता लोग भी सहयोग कइल। एह संस्था के संचालन में पाण्डेय कपिल के साथ डॉ. अनिल कुमार राय आंजनेय, प्रो. ब्रजकिषोर, कृश्णानंद कृश्ण जइसन साहित्यकार भरपूर सहयोग दिहलें। डॉ. प्रभुनाथ सिंह जी पूर्व मंत्री, बिहार एकर कई-एक अधिवेशन जगह-जगह करवलीं।

1970 का बादे मुजफ्फरपुर में ‘बिहार विष्वविद्यालय भोजपुरी साहित्य परिशद, के स्थापना भइल। संस्था के संचालन में डॉ. ललन प्रसाद सिंह, डॉ. रिपुसूदन प्रसाद श्रीवास्तव आ डाॅ0 प्रभुनाथ सिंह के योगदान रहल। एही लोग के प्रयास से बिहार विष्वविद्यालय में भोजपुरी के पढ़ाई षुरू भइल। मान्यता के दिसाई भोजपुरी खातिर ई पहिला आ महत्त्वपूर्ण कार्य रहे। एह मान्यता खातिर विष्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. टी. बी. मुखर्जी के कृतज्ञता ज्ञापित ना कइल जाए त अनुचित होई। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के साहित्यिक गतिविधि, बिहार विश्वविद्यालय में भोजपुरी के पढ़ाई आ राजनेता केदार पांडेय जी के प्रयास से बिहार सरकार ‘भोजपुरी अकादमी’ के गठन कइलस। मान्यता के दिसाईं भोजपुरी खातिर ई दोसर महत्त्वपूर्ण कदम रहल। धीरे-धीरे पटना विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय आ देवघर हिन्दी विद्यापीठ जइसन शिक्षा संस्थान भोजपुरी के चाहे त विषय के रूप में चाहे एक पत्र का रूप में शामिल कर के अकादमिक मान्यता के विस्तार दिहलस। बिहार विश्वविद्यालय आ एकरा से अलग भइल जयप्रकाश वि.वि. में त आनर्स तक पढ़ाई शुरूए हो गइल रहे।

सन् 1992 के शुरूआत में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के जुझारू पदाधिकारी आ ‘भोजपुरी कलम’ के क्रांतिकारी संपादक पशुपति नाथ सिंह के प्रयास आ संयोजन में सम्मेलन का छपरा अधिवेशन में छात्र आ युवा साहित्यकार लोग के शामिल करत ‘भोजपुरी वाहिनी’ के गठन कइल गइल। एह में डॉ. ब्रजभूषण मिश्र आ कुमार विरल उनका साथे सहयोग कइलन। वाहिनी के कार्य में जयकांत सिंह ‘जय’, रवीन्द्र शाहाबादी, रवीन्द्र रवि, अम्बदत गुंजन आ जीतेन्द्र वर्मा जइसन युवा आ छात्र लोग सक्रिय भागीदारी कइल। छपरा अधिवेषन में वाहिनी भोजपुरी के मांग के लेके एगो लमहर जुलुस निकललस जवना में बूढ़-पुरनिया सभे शामिल भइल। भोजपुरी के प्रति वातावरण बनावे में भोजपुरी वाहिनी के कार्यक्रम पूरा योगदान कइल। पशुपति जी भोजपुरिया एम.एल.ए. आ एम.पी. लोग से संपर्क सधलें आ भोजपुरी अउर भोजपुरी क्षेत्र के पिछड़ापन के सवाल उठवलें।

अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के प्रयास से मगध विश्वविद्यालय से अलग भइल वीर कुँअर सिंह विश्वविद्यालय में तत्कालीन कुलपति डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा भोजपुरी विशय में एम.ए. के पढ़ाई षुरू कइल गइल। अकादमिक स्तर पर ई एगो विस्तार रहे। अब त पी-एच.डी. शोध-प्रबंध भी भोजपुरी में प्रस्तुत हो रहल बा। बी.आर.ए.बिहार विश्वविद्यालय में भोजपुरी में शोध-प्रबंध प्रस्तुत करे के अनुमति मिल चुकल बा। अकादमिक स्तर पर ई बड़हन उपलब्धि मानल जा सकत बा।

पिछला सदी के अंत में बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के ‘बिहार विश्वविद्यालय भोजपुरी साहित्य परिषद, के विस्तार देत’ भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद’ के स्थापना भइल, जवना से देश भर के भोजपुरी भाषी कॉलेज आ विश्वविद्यालय शिक्षक के जोड़े के प्रयास भइल। प्रो. भीमसेन सिंह के सहयोग से एकर पहिला अधिवेषन दिल्ली में भइल। भोजपुरी का मांग के लेके जंतर-मतर पर धरना दिआइल। महाराजगंज लोक सभा के सांसद श्रीमती गिरिजा देवी के प्रयास से एगो शिष्ट मंडल तत्कालीन राश्ट्रपति से मिल के अष्टम अनुसूची आ साहित्य अकादमी से मान्यता के माँग कइल। प्रतिनिधिमंडल में शामिल रहलें- छपरा के सांसद श्री लाल बाबू राय, पाण्डेय कपिल, डॉ. प्रभुनाथ सिंह, डॉ. रिपुसूदन श्रीवास्तव आ नागेन्द्र प्रसाद सिंह।

मान्यता के दिसाईं जे भी छोट-बड़ उपलब्धि मिलल, ऊ बिहारे तक सीमित रहल। उत्तर प्रदेश  के पूर्वाचल जे भोजपुरी बोले वाला लमहर भू-भाग बा, खाली साहित्यिक गतिविधि तक सीमित रहल। हालांकि, स्वतंत्रता सेनानी चित्तू पांडेय विधायक भइला पर विधान सभा में आ बलिया के सांसद चन्द्रिका सिंह संसद में भोजपुरी में भाषण देवे के कोशीश कर के भोजपुरी के मान्यता खातिर बेचैनी देखा चुकल रहस। सलेमपुर से सांसद-रामनरेष कुषवाहा भी भोजपुर राज्य निर्माण के सवाल उठवले रहस, बाकिर उत्तरप्रदेष में वातावरण ना बन पावल। उत्तर प्रदेश के सक्रिय लोग अ.भा.भो.सा.स. के गतिविधि में भरपूर योगदान देत रहल। आंजनेय जी, रामनगीना राय, लक्ष्मीशंकर त्रिेवेदी, अशोक द्विवेदी अइसन लोग में आगे-आगे रहलें। उत्तरप्रदेश में, अखिल भारतीय भोजपुरी परिषद, लखनऊ के स्थापना कर के प्रकाशन आ आयोजन का माध्यम से डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य एगो जागृति पैदा कइली। एह संस्था का माध्यम से ओह लोग का मन से ई शंका निकलल, जेकरा मन में भोजपुरी से हिन्दी के अहित के बात बइठल रहे।

भारतीय प्रशासनिक सेवा के पदाधिकारी डॉ. सतीश चन्द्र त्रिपाठी (महाराष्ट्र) आ डॉ. अरूणेश नीरन सेतु न्यास मुंबई के सहयोग से भारत आ भारत के बाहर बड़ा-बड़ा नगरन-महानगरन में अंतर्राष्ट्रीय आ राष्ट्रीय स्तर पर विश्व भोजपुरी सम्मेलन के आयोजन कइलें आ आजो कर रहल बाड़न। ई आयोजन सब अतना ‘गलैमरस’ यानी-देखनउक आ शोभनउक भइल कि खूब मिडिया कवरेज मिलल। भोजपुरी के प्रति उपेक्षो भाव राखेवालन का भोजपुरी का प्रति सोचे खातिर मजबूर होखे के पड़ल। एह संस्था से प्रशासनिक स्तर के पदाधिकारी लोग खुल के जुड़ल।

भोजपुरी के सजग पहरूआ आ आयोजक डॉ. प्रभुनाथ सिंह जी ‘एगो संस्था’ विश्व भोजपुरी सम्मेलन’ के स्थापना कइलीं, जवना के मुख्यालय, दिल्ली में रखाइल। एकरो अधिवेशन दिल्ली सहित कई जगह भइल। एह संस्था से उहाँ का राजनेता लोग के जोड़नी। देश के हिन्दी के नामी साहित्यकार केदारनाथ सिंह के सहयोग त उहाँ का मिलते रहल, मैनेजर पाण्डेय जइसन आलोचक भी जुड़लें। विदेश से पेगी मोहन, सुचिता रामदीन, सरिता बुधु जइसनो लोग सक्रिय भइल, जवना से भोजपुरी का बल मिलल। एही संस्था के भूमिका रहे कि आगे चल के महाराजगंज (बिहार) के लोक सभा सांसद प्रभुनाथ सिंह जी संसद में भोजपुरी के आवाज बुलंद कइलीं। समय-समय पर रघुनाथ झा, सुशील मोदी, योगी आदित्यनाथ, साहित कई सांसद लोग प्रभुनाथ सिंह जी के समर्थन में आगे आइल।

एह सब गतिविधि के अइसन प्रभाव पड़ल कि राजग सरकार के गृहराज्य मंत्री चिन्मयानंद जी का सहयोग से पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर में एम.ए. हिन्दी का पाठ्यक्रम में भोजपुरी एक पत्र का रूप में स्वीकृत भइल। बाद में गोरखपुर विश्वविद्यालय में भी ई अइसहीं एक पत्र के रूप में पाठ्यक्रम में स्वीकृत भइल। मान्तया के दिसाईं ई भोजपुरी का एगो फइलाव मिलल।

ई सब आयोजन, अधिवेशन, अलग संस्थन द्वारा समय-समय पर मांग के प्रस्ताव, डॉ. केदारनाथ सिंह, डॉ.मैनेजर पाण्डेय, डॉ. प्रभुनाथ सिंह वगैरह के सम्मिलित प्रयास से साहित्य अकादमी के कम-से-कम अतना मान्यता त देवहीं के पड़ल, जवना से अभी तक भोजपुरी कवि धरीक्षण मिश्र आ मोती बी.ए. जी का 25-25 हजार के फेलोशिप मिल चुकल बा। साहित्य अकादमी के अंग्रेजी पत्रिका ‘द इंडियन लिटरेचर’ के एक अंक पूरा सन् 2000 ई0 में भोजपुरी पर केन्द्रित बा। एह अंक में भोजपुरी कविता-कहानी-नाटक के अनुवाद छपल बा। ई भोजपुरी साहित्य के पहचान बनावे में आ दुनिया के जनावे में महत्त्चपूर्ण योगदान देले बा।

दुगो संस्था- ‘पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद्’ कोलकाता आ पूर्वांचल एकता मंच’, दिल्ली के योगदान मान्यता के दिसाईं कम नइखे। पूरब आ पछिम दूनों छोर के एह महानगरन में भोजपुरी भाषियन के संगठन कर के आ तरह-तरह का आयोजन का माध्यम से भोजपुरी के अलख जगावे आ मान्यता का दिसाईं मांग रखे में ई दूनों संस्था के महत्त्वपूर्ण योगदान बा। ‘भोजपुरी भारती’ जइसन संस्था गाँवा-गाँई छोट-छोट आयोजन करके सारन, सीवान आ गोपालगंज जिलन में भारतीय जागरण कइले बा।

मान्यता खातिर भोजपुरी आन्दोलन में पत्र-पत्रिका के भूमिका कम ना रहल। जब भोजपुरी में पत्र-पत्रिका ना निकलत रहे, तब 1914 ई. में महान विद्वान आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी पत्रिका- ‘सरस्वती’ में हीरा डोम के भोजपुरी कविता ‘अछूत की शिकायत’ शीर्षक से छाप के एक तरह से भोजपुरी के साहित्यिक मान्यता प्रदान कइलीं। तब से भोजपुरी कविता आ गद्य हिन्दी के पत्र-पत्रिकन में छपे लागल। एह में ‘आज’ दैनिक के लमहर योगदान बा। आज में कविता त छपबे करे, स्तम्भ में ‘डॉ.मुक्तेश्वर तिवारी’ बेसुध के लिखल ‘चतुरी चाचा की चटपटी चिट्ठी’, ‘बरिसन प्रकाशित कइलस। एह से दुनिया भोजपुरी गद्य के लोहा मनलस। आज के अलावे कृषक, योगी, नवराष्ट्र, नवशक्ति, जनजीवन, नवभारत टाइम्स, नवभारत, राँची एक्सप्रेस, प्रभात खबर, साहित्य अमृत जइसन पत्र-पत्रिका भोजपुरी के खोज खबर लेत रहल। गद्य-पद्य छापत रहला आजो ‘दोपहर सामना’ (मुंबई), ‘रांची एक्सप्रेस’, ‘प्रभात खबर’ जइसन अखबार ई काम कर रहल बा।

निखालिस भोजपुरी के पहिला अखबर- ‘बगसर समाचार’ निकाले के हियाव 1915 ई. में जय परगास नारायण कइलें। ओकरा बाद से आज तक सैंकड़न पत्र-पत्रिका भोजपुरी के निकलल, बंद भइल आ आजो कुछ निकल रहल बा। एह में से कुछ के चर्चा ना कइल जाए त अनुचित होई। विशुद्ध रूप से भोजपुरी के साहित्यिक पत्रिका 1948 ई. में महेन्द्र शास्त्री जी के संपादन में ‘भोजपुरी’ (द्वै मासिक) नाम से निकलल, एक अंक निकल के बन्द हो गइल। 1952 में रघुवंश नारायण सिंह ‘भोजपुरी’ निकाले के शुरू कइलीं एकर पाँच अंक के संपादन प्रो. विश्वनाथ सिंह कइलीं। ई पत्रिका दम धरत, सुसतात कबो पटना आ कबो आरा से प्रकाशित होत 1974 ई. तक निकलल। अप्रैल 1960 ई से तिमाही ‘अँजोर’ निकले के शुरू भइल। एकरा प्रकाशन का पाछे पाण्डेय नर्मदेश्वर सहाय के धन आ अविनाश चन्द्र विद्यार्थी के मेहनत से रंग आ गइल। पं. गणेश चैबे जी के मानल जाए त एह पत्रिका के गुन देसे में ना विदेशो में गावल गइल। ई 1979 तक निकलल, जवना में कई गो विशेषांक रहे। डॉ.  स्वामीनाथ सिंह के संपादन में ‘भोजपुरी कहानियाँ’ मासिक भोजपुरी संसद, वाराणसी से 1964 में निकले के शुरू भइल। बाद में एकर संपादन प्रो. रामबली पाण्डेय आ गिरिजा शंकर राय ‘गिरिजेश कइलीं आ ई 1977 ई. तक निकलल। ई पत्रिका पाठक वर्ग तइयार कइलस। एकर मांग एतना रहे कि ‘ए.एच.व्हीलर’ एकर वितरक बन गइल। डॉ. जितराम पाठक के संपादन में ‘भोजपुरी साहित्य’ 1964 ई. सें 68 ई. तक आरा से भोजपुरी साहित्य मंडल के मुख पत्र के रूप में निकलल, फेर 75 से 77 तक बक्सर से निकल के भोजपुरी के स्तरीय साहित्य परोसलस। पाण्डेय कपिल के संपादन में छपेवाला ‘उरेह’ भोजपुरी-सृजनात्मक साहित्य में गुणात्मक परिवर्तन ले आवे के सफल प्रयास कइलस। 1976 ई. से निकले वाली पत्रिका के अनियमित कई अंक निकलल। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पत्रिका 1976 ई. से ही पटना से पहिले डॉ. बसंत कुमार के संपादन में 2 अंक, बाद में पाण्डेय कपिल के संपादन में चार अंक (1980 ई. में), 1986, 1987, 1988 में एक-एक अंक निकलल। उहें के संपादन में 1990 ई. से 2001 ई. तक मासिक निकलल। आजकल एकर संपादन प्रो. ब्रजकिशोर जी, डॉ.जीतेन्द्र वर्मा के सहयोग से कर रहल बानी। ई पत्रिका साहित्यकारन से सृजनात्मक सहयोग लेवे में आगे रहल आ खोज-खोज के साहित्यकारन के अपना साथ जोड़लस। एह पत्रिका के प्रकाशन में अर्थ सहयोग सत्यनारायण सिंह लगातार कइलें। आजकल प्रो. ब्रजकिशोर लगातार आ डॉ. जौहर सफिया बादी समय-समय पर अर्थ सहयोग देके साहित्यिक आन्दोलन के कायम कइले बाड़न। 1977 ई. में पं. बंग भोजपुरी परिषद के ओर से त्रैमासिक ‘भोजपुरी माटी’ निकलल। 1980 ई. से ई मासिक निकल रहल बा। पहिले एकर प्रधान संपादक प्रो.शिवनाथ चैबे आ संपादक वीरेन्द्र पाण्डेय रहीं। आजकल क्रमशः वीरेन्द्र पाण्डेय आ अनिल ओझा ‘नीरद’ रहल बानी। प्रबंध संपादक का रूप में सभाजित मिश्र के सहयोग उल्लेखनीय बा। निरंतरता से भोजपुरी लेखकन में ई उत्साह बनवले रखले बा।

सन् 1979 ई. में बलिया से डॉ. अशोक द्विवेदी के संपादन में ‘पाती’ शुरू भइल, चार अंक निकलल। नया कलेवर में तिमाही 1992 ई. से लगातार निकल रहल बा आ साहित्यिक पत्रिका के नया प्रतिमान स्थापित कइले बा। एकरे में छपल कई सामग्री के ‘द इंडियन लिटेरेचर’ अनुवाद कर के छपलस। डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य के संपादन में ‘भोजपुरी लोक’ कम अलख नइखे जगवले। हालाँकि एह में हिन्दी आ भोजपुरी दूनों भाषा में रचना छपत रहल। डॉ. अरूणेश नीरन के संपादन में 1996 ई. से तिमाही ‘समकालीन निकलत रहल बा। ई पत्रिका देखनउक-शोभनउक त बटले रहेबे कइल, ई भोजपुरी क्षेत्र के हिन्दी-संस्कृत के विद्वानन से भोजपुरियो लिखवइले बा। विनोद कुमार देव के संपादन में निकले वाला ‘महाभोजपुर’ के भूमिका कम नइखे।

आज के तारिख में ‘पाती’, भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका, भोजपुरी माटीं, हैलो भोजपुरी, भोजपुरिया संसार निकल के भोजपुरी आन्दोलन के गति दे रहल बा। ‘ई’ पत्रिका- ‘आखर’, मैना, मंथन आदि भरपूर साहित्य परोस रहल बा, नया-नया लोग में भोजपुरी के प्रति प्रेम पैदा कर रहल बा। बाकिर एह सब के बीचे भोजपुरी वार्ता, बिगुल, उगेन, कोइल, भोजपुरी कलम, लुकार, जगरम, गाँव घर, भोजपुरी अकादमी पत्रिका, परिछावन, भाषा-सम्मेलन पत्रिका, जिनगी आदि के योगदान ना भुलावल जा सके।

भोजपुरी का मान्यता का दिसाईं आकाशवाणी दूरदर्शन, फिल्म आ कैसेट-रिकार्ड जइसन मिडिया के कम योगदान नइखे। लटत-बूड़त सैकड़ों फिलिम भोजपुरी में बन चुकल बा। कैसेट उद्योग से भोजपुरी गीतन के गूँज देश-विदेश चहुँओर पहुँचल बा। एकर आपन एगो बाजार तइयार भइल बा। ई अलग बात बा कि फिल्म आ कैसेट पर संस्कृति के बिगड़ल रूप प्रस्तुत करे के आरोप लागेला, बाकिर एकरा से भोजपुरी के प्रचार प्रसार खूब भइल बा। भोजपुरी के दुनिया जाने लागल बा। मनोज तिवारी ‘मृदुल’ जइसन लोकप्रिय कलाकार जब-जब मौका मिलल बा, अपना मंच से मान्यता के दिसाईं सरकार से निहोरा कइले बाड़न। खेती-किसानी आ लोक संस्कृति के बात क्षेत्रीय भाषा में करे के निर्णय से पटना से चउपाल में भोजपुरी भाषा के कप्पीयरर बुद्धन भाई के भोजपुरी जनता बड़ा पसन करत रहे। भोजपुरी नाटक ‘लोहा सिंह’ धारावाहिक प्रसारित होत रहे, जवना से जनता जुड़ल। अइसनके कार्यक्रम जुगानी भाई गोरखपुर से हरिराम द्विवेदी बनारस से प्रस्तुत करके भोजपुरी के श्रोता बढ़वलें। इलाबाबाद रेडियो ‘समझावन सुकुल के परिवार, धारावाहिक देके बड़ा नाम कमइलस। पटना रेडियो भोजपुरी के मिलल जुलल कार्यक्रम आरती में साहित्य, लोक साहित्य आ संगीत के प्रस्तुति कर के मिडिया में मान्यता देलस। दूरदर्शनो  भोजपुरी कार्यक्रम दे रहल बा।

एह आन्दोलन के भूमिका में सैकड़न साहित्यकारन के कइसे ना कृतज्ञ भइल जाई जे अर्थ का माथा पर लात धरत, बिना कवनो प्रकाशन आ वितरण-व्यवस्था के आपन धन गला के किताब छपावत आ रहल बा आ बाँट देता। एह से भोजपुरी साहित्य के भंडार भरल जा रहल बा।

अब तक भोजपुर राज्य निर्माण के मांग उठ रहल बा। सबसे पहिले ई मांग आनंद मार्ग द्वारा उठावल गइल रहे। आजकल ‘भोजपुरी जनमोर्चा’ नाम से राजनीतिक दल एही मांग खातिर बनल बा।

मान्यता के दुआर तक भोजपुरी के पहुँचावे में नापल-जोखल कदम उठावे के काम महाराजगंज (बिहार) लोक सभा के प्रतिनिधि सांसद प्रभुनाथ सिंह जी कइलीं। अन्तर्राष्ट्रीय भोजपुरी संगठन-विश्व भोजपुरी सम्मेलन के कार्यकारी अध्यक्ष सांसद प्रभुनाथ सिंह आपन निजी बिल – ‘द कंस्टिच्यूशन एमेंडमेंट बिल 2000, संख्या 6’ पेश कइलीं। बहस भी करइलीं, बाकिर सफलता ना मिलल। बाकिर, डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’, अध्यक्ष, भोजपुरी विभाग, बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर एह दिसाईं उनका से संपर्क बनवले रखलन। ऊ भोजपुरिया क्षेत्र के प्रतिनिधि सांसद आ विधायक लोग से भी संपर्क साधत रहलन, बाकिर, जब 2003 ई. में संविधान में संशोधन करत मैथिली, संथाली, बोडो आ डोगरी के संविधान का अष्टम अनुसूची में शामिल कर लिहल गइल त लागल कि भोजपुरी का साथे उपेक्षा भाव राखल जा रहल बा। भोजपुरिया जन-जीवन दुःखी आ उदास हो गइल। बाकिर, एह दिसाईं अउर जोर-शोर से आवाज बुलंद कइल जात रहल। प्रभुनाथ बाबू, फेर एक बेर एह सवाल के उठवलीं त तत्कालीन गृह मंत्री आडवाणी जी के आश्वासन त मिलल, बाकिर राजग सरकार दुबारा ना बनल। प्रभुनाथ सिंह जी के एह प्रयास का समर्थन ओह घरी आ बादो में समय-समय पर सांसद रधुनाथ झा, नीतिश कुमार, सुशील मोदी, योगी आदित्यनाथ के मिलत रहल। यू.पी.ए. सरकार बनला का बादो प्रभुनाथ बाबू संसद में एह दिसाईं प्रयास करत रहलीं। सन् 2005 में बिहार में नीतीश जी के बिहार सरकार बनला का साथे भोजपुरी के अष्टम अनुसूची में शामिल करे के प्रस्ताव कैबिनेट के पास कर के भेजलस। एह में नोखा के विधायक श्री रामेश्वर चैरसिया जी के मुख्य भूमिका रहल।

सांसद प्रभुनाथ सिंह जी एह दिसाईं यू.पी.ए. अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी से भेंट करके भोजपुरी के अष्टम अनुसूची में शामिल करे के अनुरोध कइलीं। यू.पी.ए. सरकार महापात्रा कमिटी के गठन कर के रिपोर्ट मंगले रहे। ई रिपोर्ट आइल आ अनुकूल आइल।

एही बीच 4 नवम्बर के अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का सासाराम अधिवेशन में लाखन का जन समूह का सामने केन्द्र सरकार के दूगो मंत्री डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह आ श्रीमती मीरा कुमार जी ई आश्वासन देके गइलीं कि अगिला सत्र में भोजपुरी के अष्टम अनुसूची में शामिल कर लिहल जाई।

एही बीचे दिनांक 11 दिसम्बर 2006 के सांसद प्रभुनाथ सिंह का ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का उत्तर में केन्द्रीय बाकिर यू.पी.ए. के शासनकाल के मंत्री लोग डॉ. मीरा कुमार, डॉ. रघुवंश प्र. सिंह, श्रीयुत् श्रीप्रकाश जायसवाल के आश्वासन आश्वासने भर रहल, पूरा ना भइल।

2013 ई0 के नवम्बर में अ.भा.भो. साहित्य सम्मेलन के पटना अधिवेशन में भाजपा के बड़हन नेता लोग के जुटान आ चुनाव जितला पर भोजपुरी भाषा के मान्यता दिहला के आश्वासन पर भोजपुरिया 76 गो सांसद अपना क्षेत्र से दिहल। पूरा भोजपुरिया इला का भगवा रंग में रंगा गइल। चुनाव के दौरान सभा में रविशशंकर जी, रूढ़ी जी, मनोज तिवारी, जइसन लोग भोजपुरी में बोले त जनता के मन गद्गदाये लागे। प्र. मं. के प्रत्याशी मोदी जी एक-दू वाक्य बोल के भोजपुरी के सम्मान देखवलीं। बाकिर मान्यता वाला काम एन.डी.ए. सरकारो से अबहीं तक पूरा ना भइल। कोरा आश्वासने भर बा। एह बीचे ‘पूर्वांचल एकता मंच’ दिल्ली, आ ‘भोजपुरी जन जागरण अभियान समिति’ दिल्ली में लगातार धरना-प्रदर्शन करके आन्दोलन के आगे बढ़ा रहल बा। ‘जन जागरण अभियान समिति’ फेर अगस्त में संसद का शीत सत्र के दौरान धरना-प्रदर्शन के कार्यक्रम बना रहल बा।

उत्तर प्रदेश से माननीय सांसद जगदम्बिका पाल जी प्राणपन से भोजपुरी के मान्यता खातिर सक्रिय भइल बानी। उहाँ के पीठ पर माननीय सांसद मनोज तिवारी जी आ मैथिली भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष श्री अजीत दूबे जी असवार बानी राजस्थानीयो के मान्यता के सवाल बा, एह से राजस्थान के सांसद मेघवाल साहेब के साथ एह लोग के संपर्क बनल बा। भोजपुरी आन्दोलन थथमल नइखे।

आज जब चउतरफा खुशी बा आ केन्द्रीय मंत्री के द्वारा संसद का आश्वासन मिलल बा, त ई विश्वास कइल जा सकत बा कि ई काम पूरा होई। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के मातृभाषा प्रेम जग जाहिर बा आ संविधान सभा के अध्यक्ष सच्चिदानंद सिनहो के। एह दुनु जने का भाषा के संवैधानिक मान्यता मिले में अतना देरी अचरज के विषय बा। बाकिर देरे से सही, मिलत जाए।

अंत में हम अतने कहब कि अगर मान्यता मिल जात बा, त हमनी के काम खतम नइखे होत। हमनी का अउर सजग भइला के जरूरत बा। हमनी का अपने लोग पर धेयान देवे के बा। काहे कि मान्यता के विरोधी लोग मान्यता का बाद आगे आके ओकर लाभ लेवे के चाही। हम ई बता देवे के चाहत बानी कि साहित्य आकादमी में शामिल भोजपुरिया लोग हिन्दी के त काम करे, भोजपुरी का मान्यता के बाते ना करे। ई डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी, अध्यक्ष, साहित्य अकादमी के मैथिली-हिन्दी साहित्यकार बाबा नागार्जुन से भइल बात-चीज में स्पष्ट भइल। अइसने कुछ बात बंगला के विद्वान अन्नदाशंकर राय 1989 ई. में शांतिनिकेतन में पं0 गणेश चैबे आ डॉ.  कृष्णदेव उपाध्याय के बतवले रहीं।

अंत में हमरा एतने कहे के बा कि भोजपुरिया का अपना अस्मिता के पहचान करे के बा। आन्दोलन चलत रहे के चाहीं। आपन पहचान करीं, आपन अस्तित्व बचवले राखीं। भोजपुरी एगो लमहर जातीय संस्कृति ह। एकर पहचान बनल रहे।

अंत में मोती बी.ए. के कुछ पाँति प्रस्तुत करत हम विराम देवे के चाहब-

अपना चिजुइया के जेहि नाहीं बूझी,

दुनिया में ओकरा के केहू नाही पूछी ।

अपने चिजुइवा से अपने बेगाना,

चारो ओरिया खोज अइल पवल ना ठेकाना।