भोजपुरी के इतिहास

भोजपुरी भाषा के इतिहास पर एगो नजर

भोजपुरी के इतिहास

bhojpuriडॉ. जयकांत सिंह “ जय ”

 अध्यक्ष

भोजपुरी विभाग

लं.सिं.म. , मुज्जफरपुर , बिहार

 

भोजपुरी भारतीय आर्य भाषा परिवार के भाषा ह। इ लगभग पचास हजार वर्गमील से उपर के भारतीय भूभाग में बसेवाली जनता के मातृभाषा ह । भारत के आलावा नेपाल , मारिशस, फिजी , सूरीनाम , गुयाना , जमैका आदी  कई देशन में बोले लिखे आ पढ़े जाए के कारन एकरा अन्तर्राष्ट्रीय भाषा कहाए के  स्वाभाविक अधिकार प्राप्त बा। देश विदेश में बसल लगभग बीस करोड़ लोगन के भाषा भोजपुरी के पास लोक –शिष्ट साहित्य के अकूत भण्डार बा। एकरा अतीत , वर्तमान अउर भविष्य के लेके भोजपुरी भाषी , भोजपुरी प्रेमी , भाषाविद , साहित्यकार , शिक्षक , शिक्षाविद् आदी के बीच विमर्श के एगो नया दौर शुरू भइल बा , जवन एह भाषा अउर भाषा भाषी खातिर शुभ सूचक बा ।

 अब जहाँ तक भोजपुरी भाषा के अतीत अथवा प्राचीनता के सवाल बा त भाषा के अर्थ “भोजपुरी” शब्द के पहिल लिखित प्रयोग सन् १७८९ ईo में बतावल जाला। डॉक्टर अब्राहम जार्ज ग्रीयर्सन रेमन के “शेरमुताखरिन” के अनुवाद के भूमिका में एगो भोजपुरी मुहावरा के प्रयोग करत एकर उल्लेख कइले बाड़ेन बाकिर एकर मतलब ई नइखे की भाषा के अर्थ में भोजपुरी के पैदाइश १७८९ ई० में भइल भा एकरा पहिले एकर अस्तित्व ना रहे। साँच बात ई बा की भोजपुरी बोली भा भाषा , लोक साहित्य आ संस्कृति के अध्यन के ओरी ध्यान सबसे पहिले पश्चिम आ खास कर के यूरोपियन बिद्वान साहित्यकार लोग के गइल आ उहे लोग एकरा भाषिक संरचना , लोकसाहित्य संपदा आ महत्व से भारतीय आ भोजपुरी भाषी बिद्वान साहित्यकार लोगन के परिचय करावल।

भोजपुरी भाषा के अध्यन अनुसंधान आ ओकरा लोक साहित्य संपदा के संकलन – संपादन करे वाला पश्चिमी बिद्वान लोग में प्रमुख रहलें जौन बीम्स , रेवरेंड सेमुअल , हेनरी केलौग ,रुडोल्फ हार्नले , एजा एम चाइल्ड , एल सेंट जोसेफ ,ई. डेविड ,डब्लू. एल . हिल्बर्गे , हार्स्टमैन जार्डन,मोनिका ,डॉ ग्रियर्सन आदि। सन् १९३९ -४० में आवत आवत भारतीय बिद्वान लोग के पश्चिम के बिद्वान लोगन से प्रभावित होके भोजपुरी भाषा के अध्यन – अनुसंधान आ ओकरा शब्द साहित्य संपदा के संकलन संपादन के ओर देग बढावल।

भारतीय बिद्वानन में डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी , डॉ. उदय नारायन तिवारी , डॉ. भोला नाथ तिवारी , डॉ. विश्वनाथ प्रसाद , डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय , पं. गणेश चौबे , दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह नाथ , रघुवंश नारायण सिंह , आचार्य महेंद्र शास्त्री , राहुल सांकृत्यान आदि भोजपुरी भाषा बिषयक अध्यन आ लेखन के गति दीहल लोग। जहाँ डॉ. हार्नले भोजपुरी के आधुनिक आर्य भाषा के पूर्वी गोडियन वर्ग के बिहारी खाना के के बोली बतवलें उहँवे डॉ. ग्रियर्सन ओकरा के बहरिंग शाखा के पूर्वी समुदाय के बिहारी वर्ग के भाषा साबित करत भोजपुरी के मागधी अपभ्रंश से विकसित भाषा साबित कइले। एकरा बाद भारतीय भाषाविद  बिद्वान डॉ. चटर्जी , डॉ. धीरेन्द्र वर्मा , डॉ. तिवारी आदि डॉ. ग्रियर्सन के विचार से प्रभावित होके भोजपुरी के मगधी अथवा अर्ध मागधी अपभ्रंश से विकसित बतावल सन् १००० ई. के बाद के बोली आ भाषा साबित करत आइल बा। आजुओ अधिकांश बिद्वान भाषाविद एही मत के आग्रही बाड़ें।

बाद में भोजपुरी भाषा के भोज आ भोजपुर से जोड़ के अध्यन करे वाला बिद्वान जइसे डॉ. एस. पी. बनर्जी , पृथ्वी सिंह मेहता , डॉ. राहुल सांकृत्यान , रघुबंश नारायण सिंह आदि एकरा के और प्राचीन बतावल। रघुबंश नारायण सिंह भोजपुर के बैदिक विश्वामित्र के जजमान प्रतापी भोजगण से जोड़ के ओकरा बोली के बैदिक भाषा से विकसित भाषा बतवलें। डॉ. जितराम पाठक भोजपुरी के बैदिक भाषा , पाली कोसली आ अवधि से भाषीक संरचना आ बैदिक , पौराणिक सहित एतिहासिक संदर्भन से जोड़ के तुलनात्मक आधार पर अध्यन करत बहुते प्राचीन आ जन भाषा साबित कइलेन। भोजपुरी भाषा के प्राचीनता के अध्ययन खातिर डॉ. जयकांत सिंह “जय” के पुस्तक “भारतीय आर्य भाषा आ भोजपुरी ” के देखल जा सकत बा।

अबही तक भोजपुरी भाषा के जवन व्याकरण आ शब्दकोश प्रकाशित बा ओकरा में सन्  १९१५ ई. में लिखल शिवदास ओझा के “ भोजपुरी के ठेठ भाषा व्याकरण ” से लेके २०१३ में प्रकाशित डॉ. जयकांत सिंह “जय” के “ मानक भोजपुरी भाषा , व्याकरण आ रचना ” तक प्रकाशित छोट बड़ दू दर्जन व्याकरण ग्रन्थ आ सन् १९४० ई. में लिखाइल  एल. सेंट जोसेफ के मोतिहारी मिशन हाउस में छपल “ भोजपुरी शब्दकोष ” से लेके सन् २००९ ई. में केंद्रीय हिंदी संस्थान , आगरा से प्रकाशित “भोजपुरी – हिंदी – इंग्लिश लोक शब्दकोष ” तक लगभग डेढ़ दर्जन छोट बड़ शब्दकोषन के चर्चा कइल जाला ।

भोजपुरी लोक साहित्य के ले के अबही तक जेतना अध्यन अनुसंधान आ संकलन –संपादन के काम भइल बा ओतना साइदे कवनो आउर भारतीय भाषा में भइल होई। भोजपुरी भाषा के इतिहास के कई पुस्तक प्रकाशित आ कईगो पाण्डुलिपि अभी प्रकाशन के इन्तेजार में बा। प्रकाशित पुस्तकन के इतिहास में प्रमुख बा रस बिहारी पाण्डेय के “ भोजपुरी भाषा का इतिहास ”  , डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य के “ भोजपुरी एक प्रश्न अनेक ” डॉ. जयकांत सिंह  के पुस्तक “भारतीय आर्य भाषा आ भोजपुरी ” आदि। सन्  १९५४ ई. में प्रकाशित डॉ. उदयनारायण तिवारी के ग्रन्थ “ भोजपुरी भाषा और साहित्य ” भोजपुरी भाषा के इतिहास जाने ला शोधपूर्ण ग्रन्थ बा। अइसे एकरा आलावा भी कई बिद्वानन के काम भोजपुरी भाषा के इतिहास के लेके बा।

जहाँ तक भोजपुरी भाषा में लिखित आ प्रकाशित काव्य आ गध्य साहित्य के बात बा त काव्य साहित्य के इतिहास त सिद्ध साहित्य के सिद्ध कवि सरहथा , शबरप्पा , भुसुकप्पा आदि नाथपंथ के योगी कवि गोरखनाथ , चौरंगीनाथ , भरथरी , गोपीचंद आदि , सन्त साहित्य के संत कवि कबीरदास , धरमदास ,दरियादास ,धरनिदास ,लक्ष्मी सखी , भिनक राम , भिखम राम , टेकमन राम , रामेश्वर दास आदि से लेके आज के आधुनिक कवि लोग के काव्य परम्परा तक विस्तार लेले बा। गध्य साहित्य के लेखन के विविध विधात्मक इतिहास सन् १९२० ई. से शुरू भइल बा। भिखारी ठाकुर , राहुल सांकृत्यान , गोरखनाथ चौबे , छांगुर त्रिपाठी, आदि भोजपुरी के नाटक एंकामी सन् १९४० ई. तक धूम मचा चुकल रहे। ओईसही बिंध्याचल प्रसाद गुप्त , अवध बिहारी सुमन के कहानी सन् १९४८ ई. तक काफी चर्चित हो चुकल रहे। महेंद्र शास्त्री के लघु कथा “का उ सोना ना रहे ” निबंध “ पानी ” अवधेन्द्र नारायण के आलोचनात्मक निबंध “भोजपुरी के आदि कवि कबीर दास ” आदि भोजपुरी भाषा के साहित्यिक अभिव्यक्ति क्षमता के लोहा सन् १९४८ तक मनवा चुकल बाड़ें।

भारतवर्ष के आजादी मिलला के बाद सन् २००० ई. तक भोजपुरी भाषा , साहित्य , संस्कृति के अध्ययन , लेखन आ प्रकाशन के दिसाई बहुत व्यापक स्तर पर काम भइल। साहित्य हर विधा में प्रतिवर्ष दर्जनों पुस्तक के प्रकाशन आ राष्ट्रीय – अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन हो गइल। सिनेमा ,पत्रकारिता , लोकगीत गायन , शिक्षा , संवैधानिक मान्यता के दिसाई कईगो महत्वपूर्ण काम भइल। भोजपुरी सेवी संस्थान के गठन आ सक्रियता के बदौलत भोजपुरी भारतीय संसद में चर्चा के विषय बनल I

आज भोजपुरी भाषा के ले के भोजपुरी भाषी क्षेत्र आ जनता के बीच काफी जागरूकता फैलल बा , जे काल्ह तक भोजपुरी के बोली आ लोक साहित्य तक सिमटल भाषा बतावत रहे उहे एकरा साहित्यिक समृधि पर रीझ के एकर गरिमागान कर रहल बा। क्षेत्रीय प्रांतीय स्तर से लेके अन्तर्राष्ट्रीयस्तर तक के कई एक गो संगठन एकरा विकास विस्तार आ अधिकार के लड़ाई लड़ रहल बा। कुछ संस्थन आ व्यक्तियन के के स्वार्थ आ महत्वकांक्षा केन्द्रित गुटबाजी के छोड़ देहल जाव त आज भोजपुरी भाषा कई प्रकार के उपलब्धियन के सहारे आपन हक अधिकार पावे के ओर अग्रसर बा। शिक्षा के क्षेत्र में आज भोजपुरी भाषा के लेके काफी अध्ययन आ अनुसंधान हो रहल बा। बिहार प्रान्त के कई विश्वविद्यालय – महाविद्यालय में स्नातक आ स्नातकोत्तर स्तर तक भोजपुरी भाषा साहित्य के अध्ययन अध्य्यापन हो रहल बा। बिहार सरकार धीरे धीरे प्राथमिक स्तर से लेके उच्च विद्यालय तक के भोजपुरी शिक्षा खातिर रचनात्मक सोच मूर्त रूप ले रहल बा। बिहार के तरह ही मध्यप्रदेश आ दिल्ली सरकार के द्वारा भोजपुरी अकादमी के गठन हो चुकल बा। उतरप्रदेश के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भोजपुरी इकाई चल रहल बा। उतरप्रदेश , छतीसगढ़ , झारखंड सहित अन्य प्रान्त में भी सरकारी स्तर पर भोजपुरी अकादमी के गठन आ पढाई – व्यवस्था के रचनात्मक मांग हो रहल बा।

भोजपुरी भाषा से सम्बंधित अतीत के रचनात्मक काम आ वर्तमान के विकासोन्मुख लेखन , प्रकाशन , अध्यन –अध्यापन आ आन्दोलन रत संगठनन के रचनात्मक कार्य योजना के देख के एकर भविष्य मतलब कल काफी उज्जवल दिखाई देत बा। बाकिर एकरा दिसाई बहुत कुछ कइल शेष बा , जैसे जैसे भोजपुरी सेवी साहित्यकार , बुद्धिजीवी , शिक्षाविद् , कलाकार , पत्रकार आदि आ भोजपुरी के विकास में लागल तमाम संस्थन के योजनाबद्ध – चरणबद्ध ढंग से काम करे के होई , भोजपुरी के सरकारी स्तर पर संविधान के आठवी अनुसूची में ले के आइल जरुरी बा आ एह दिसाई प्रयास तेज करे के होई जेहसे भोजपुरी के रोजगारपरक बने में मदद मिली आ विकास भी होई। चूकी भोजपुरी भाषा एगो अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में भी दर्जा पवले बा आ अउरी विकसित हो रहल बा तब अइसन स्थिति में तमाम संगठन के मिलजुल के सार्थक पहल करे के चाही।