हमहुँ गाँवे रहतीं/ गणपति सिंह
हमहुँ माटी के दीआ बनइती।
दिअरी के दीआ जरवतीं।।
खेत पटवती ,अलुई बोअती
काश हमहुँ गाँवे रहतीं।।
धुरा धकर फाँकत सहर में
खाक में मिलल सपना बतवती।।
सुनहला इयाद के अनुभव
गाँवे सभे के हम सुनवती।।
भोर में चिरई के आवाज सुन
मुरली के हम धुन बजवतीं।।
सतरंगी घाम में भोरे भोरे
गीत गावत पोखरा में नहइती।।
धुरा धुरा हो गइल इहवाँ
गाँवे जिनगी के राग बनवती।।
आपना से जे दूर भइल बा
चरनिया पकड़ माफी मँगती।।
भूलल बिसरल इयाद जगा के
रिश्तन में नाया धार बनवतीं।।
हमहुँ रह के गाँवे किसानी करतीं
हे गणपति देश के मान बढ़वती।।