हें बरखा/ रामाज्ञा प्रसाद सिंह ‘विकल’

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हे बरखा तूं फार के छप्पर ढेर लगा द मोती के !

नया हुकुमत रहल ना सुझबुझ,
लड़िका बिलखल कहके भुख-भुख,
रोअल रोंआ देख के ई दुख;
ओहि समय अंखिया दिइलस कुछ

मइया के सूखल छाती धड ठुनुकल लड़िका गोदी के !
खुस भइनी हम देख समइया, जे बदली अबकी नक्सा,
ई अकाल आके खा गइलस घरबा के टुटलो बक्सा,
आखिर ई हड्डिओ ना छोड़ी, लाग गइल एकरा चसका,
आवऽ, घर जुरते भर दऽ जे दीं कवनो कोना घसका.
अबहीं हमरा सिर सवार बा शादी पोता-पोती के !

कतना ऊपर से बरसवल बाकिर बा नीचा माटी,
कुछ सुतला पर खटिआ खइलस, कुछ घर के लवना काठी
जर्जर तन, मनवाँ अधीर बा, कतहीं छूट गइल लाठी,
आन्ही आके बुता गइल हमरा घर के दीओ बाती,
कवन देश के काम करी जेकरा बा चिन्ता रोटी के ??

एक तल्ला से नौ तल्ला ले मारे हमरा पर ताना,
आपन देह आज अपने लागे जइसे जेहलखाना,
दोसरा के सुख-दुख का जानी अपने जबई हाल भइल,
लड़िकन के दुरदसा देखक े अब मनवाँ पयमाल भइल,
अन से भर द देहरी सब, गहना से भर द पउती के !!

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हें बरखा/ रामाज्ञा प्रसाद सिंह ‘विकल’ - भोजपुरी मंथन