जब देखीं भितरी दरपन मेंतूँ लउकेलऽ, हमरा जगहाहम तोहरा, तूँ हमरा मन में ! नीमन बाउर कुछ न बुझालारीझत…
गते-गते दिनवाँ ओराइल हो रामारस ना बुझाइल। अँतरा क कोइलर कुहुँकि न पावेमहुवा न आपन नेहिया लुटावेअमवो टिकोरवा…
उनुका से कहि दऽ / डॉ अशोक द्विवेदी रसे-रसे महुवा फुलाइल हो रामाउनुका से कहि दऽ।रस देखि भँवरा…
हम तोहके कइसे लिखीं?कइसे लिखीं किबहुते खुश बानी इहाँ हमहोके बिलग तोहन लोग से… हर घड़ी छेदत-बीन्हत रहेलाइहवों…
कोइलरि कूहे अधिरतिया आ बैरीचइत कुहुँकावे.रहि रहि पाछिल बतिया इ बैरीचइत उसुकावे. कुरुई-भरल-रस-महुवा, निझाइलकसक-कचोटत मन मेहराइलउपरा से कतना…
धुन से सुनगुन मिलल बा भँवरन केरंग सातों खिलल तितलियन केलौट आइल चहक, चिरइयन के! फिर बगइचन के…